बिहार राज्य

98 % कानून सिर्फ भाषण में इस्तेमाल होता है: मंजू सिंह

Manju Singh at Beyond The Third Eye
Written by Taasir Newspaper

8 मार्च 2018 को आरजेडी नेत्री मंजू सिंह से बातचीत के मुख्य अंश :

आप सभी को अपने आप पर गर्व होना चाहिए कि आप महिला हैं। महिला होना अपने आप में बहुत बड़ी शक्ति है बहुत बड़ी ताकत है। हम पुराने ज़माने से देखते हैं। चाहे आप किसी भी धर्म को मानने वाले हो, महिलाओं के बगैर संसार नहीं चल सकता। जितनी दया आप में है, शायद धरती पर इतनी दया किसी में नहीं है। आप जन्म देने की ताकत रखती हैं। आपसे सृष्टि चलती है इसलिए कभी भी समाज में किसी को बेटी हुई है या बेटी जन्म ली है तो दुःख नहीं बल्कि बहुत ख़ुशी मनाये। हमारे यहां क्या होता था अभी तो बहुत बदलाव आया है। आप खुद एक औरत है और औरत ही एक औरत को कहेगी कि देखो न एक बेटी हुई है तो कितनी दुःख की बात है। हम औरत है हमें तो खुश होना चाहिए क्योंकि बेटी हुई है।

देखिये, बेटा हो या बेटी, दोनों आँख की तरह है। आप किसको बोलियेगा कि मेरे लिए दाएं आँख अच्छी है या, बाएं आँख अच्छी है। आपके लिए दोनों आँखें बराबर है। किसी में भी तकलीफें होंगी तो आपको कैसा लगता है? अच्छा लगता है? उसी तरह बेटा हो या बेटी हो आपके शरीर का अंग है। आपने उसे जन्म दिया है। आप उनके माँ है। उसके सुख दुःख सब के साथी है तो आप गर्व कीजिये।

और देखिये बहुत बदलाव आया है। आप वहां (ऑडिटोरियम की ओर इशारा करते हुए) बैठी हैं, हम यहां बैठे है। क्या पहले ऐसा होता था कि हम महिलाएं घर से बहार निकल जाएं? नहीं होता था ! आज कितना बदलाव आया है! आप भी बिना परदे की बैठी हैं और मैं भी बिना घूँघट की बैठी हूँ। तो हम सब की ज़िम्मेदारी हैं कि और बदलाव लाएं। हम में वो ताकत है और आप सभी को अपनी ताकत पहचाननी होगी। आप सब अपनी ताकत पहचानिये। देखिये जब दुर्गा मां जब गुस्सा हुई थी तो पूरी दुनिया का तहस-नहस कर दी थी। आप में कितनी ताकत है? उस ताकत को पहचानिये और समाज के सुधार के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल कीजिये।

स्वाभिमान भवन में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आरजेडी नेत्री मंजू सिंह और सिकेन शेखर ‘द बिग कन्वर्सेशन’ के दौरान

बियॉन्ड द थर्ड आई द बिग कन्वर्सेशन के सवाल 1985 में जिस तरह से महिलाओं के विकास के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग की स्थापना की गई मगर हमारे सामने जो महिलायें बैठी हैं और इन लोगों की जो हालत हैं, जिस तरीके से ये कोर्ट और कचहरी का चक्कर लगाती हैं, मतलब ऐसा लगता है जैसे प्रशासन और कानून इनसे आज भी बहुत दूर हैं? कितना मुश्किल है महिलाओं की हकीकत पर आज मंत्रालय से मदद लेना जो यह कहता है कि मैं महिलाओं के लिए हूँ?

जवाब में कहा, मैं तो कहूंगी कि कानून जो है वो सिर्फ किताबों में है, पेपर में है और मीडिया तक ही सीमित है। जिसको कानून की जरूरत है उसे सिर्फ 2 प्रतिशत कानून की मदद मिलती है। 98 प्रतिशत कानून सिर्फ भाषण में इस्तेमाल होता है। यह कानून इन लोगों तक पहुंचनी चाहिए और इसके लिए इन महिलाओं को ही सब कुछ करना पड़ेगा, क्योंकि कहते है कि हक़ को छीनना पड़ता है, तो कानून को छीनने के लिए खुद को मजबूत करना पड़ेगा और वह दिन ज्यादा दूर नहीं है जब महिलायें अपने हक को छीन लेंगी। कानून के लिए भी मैं कहूँगी कि वहां पर अच्छे लोगों का पहुंचना बहुत जरूरी है, ताकि कानून में शक्ति हो। कानून में कही न कही लुट-पाट है और उसका जितना फ़ायदा होना चाहिए उतना इस समाज को नहीं हो पा रहा है।

बियॉन्ड द थर्ड आई द बिग कन्वर्सेशन में अगला सवाल था, 8 मार्च का दिन हो, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बात हो और सामने ग्रामीण महिलायें हो, तो फिर सेलिब्रेशन के किस रूप का होना जरुरी लगता है? जवाब में कहा, कुछ महिलायें यहां जिस तरीके से यहां तैयार होकर बैठी हैं वो समझ रही है कि आज महिला दिवस है और उनके लिए खास है। ऑडिटोरियम में खूबसूरत वस्त्र धारण कर बैठी महिलाओं के तरफ इशारा करते हुए कही, वाकई आप लोगों ने अच्छा काम किया हैं। यह दिन सचमुच खास है। आगे द बिग कन्वर्सेशन में कहा, जिसने भी महिला दिवस की शुरुआत की बहुत बढ़िया काम किया। कम से कम बाकि दिनों से यह दिन हट के है। देखिये, जो महिलाओं की दिनचर्या हैं वह बहुत ही टफ़्फ़ है। चाहे वह वर्किंग वीमेन हो तो भी या, घर में रहती है वो भी, बहुत बर्डन ले कर चलती हैं। जैसे पुरुष है तो मान लीजिये की आज ऑफिस गए, कल मेरा मन नहीं हुआ जाने का तो नहीं गए। महिलाओं को जो हैं तीनों टाइम खाना बनाना है, बर्तन धोना है, बच्चे हैं, उसकी जिम्मेवारी है, तबीयत ठीक है या नहीं है, वो इग्नोर करके काम करती हैं। ऐसे में वह अपने लाइफ एन्जॉय नहीं कर पाती हैं। पूरे जीवन भर में घर परिवार के लिए समर्पित रहती हैं। ना ही इनके लाइफ में कोई संडे होता है, अगर कोई उनका त्योहार भी होता है, तो परिवार की खुशहाली के तौर पर जिम्मेवारी हर वक्त प्राथमिकता के रूप में होती है और यह महिलाओं की सबसे बड़ी खूबी है। ऐसे में महिला दिवस का दिन उनके लिए समर्पित होता है

बियॉन्ड द थर्ड आई द बिग कन्वर्सेशन में मंजू सिंह से अगला सवाल था, जिस तरीके से ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ ने क्राइम के कई आकड़ों व् क्राइम के ग्राफ को देश के सामने रखा। आप बताइए, इतने प्रतिशत क्राइम की रेट बढ़ जाती है। हर 2 मिनट में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार की खबर आ रही है। मुझे उन तथ्यों पर नही जाना है पर सवाल यह है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो बन जाने के बाद, तमाम क्राइम रेट आ जाने के बाद क्या प्रशासन सबक ले रही है?

जवाब में मंजू सिंह ने दो टुक में कहा, मैं कहूँगी प्रशासन सबक नही ले रही है। अगर सबक लेती तो क्राइम की दरों में इनती बढ़त नही देखने को मिलती। आगे कन्वर्सेशन में 16 दिसम्बर को 2012 को दिल्ली में निर्भया कांड को लेकर कहा, उसमें मैंने कुछ नेताओं को कहते हुए सुना कि छोटी-मोटी गलती है। यहाँ पर मैं यह सवाल करती हूँ कि अगर वह छोटी गलती है तो अपने बहु-बेटियों को क्यों सिक्यूरिटी में भेजते हैं? आप भेजे सड़कों पर बगैर सिक्यूरिटी के। उनके साथ जब वह घटना घटेगी फिर मैं पूछूंगी कि यह मामूली घटना है होती रहती है? तब ये बोले! जब ख़ुद के परिवार पर कोई घटना घटे तो बहुत बड़ी है और जब दूसरों पर घटे, जो सक्षम नहीं हैं, दबे कुचले हैं तो होता रहता है, क्यों? बहुत सारे केस को मैं भी देखती हूँ अगर ये लोग थाना जाते हैं तो पुलिस केस तक दर्ज नही करती हैं। क्यों कहाँ है प्रशासन? प्रशासन जितना बोलती है उसका 1/3 भी करें तो क्राइम की ग्राफ अपने आप नीचे जाएगी।

दिन प्रतिदिन लोग शिक्षित हो रहे हैं। बंगलौर और दिल्ली जैसे शहरों में आये दिन घटनाएँ हो रही हैं। कही न कही कहेंगे कि समाज में बहुत सारी कमियां हैं। मां बाप को भी चाहिए कि बेटियों को ही सिर्फ शिक्षा न दें कि बेटी ये पहनों, बेटी ये खाओ, बेटी वहां जाओ, वहां मत जाओ, इतनी जो रिस्ट्रिक्शन बेटियों के लिए हैं, वो बेटों के लिए भी दिया जाय। बेटों को भी समझाया जाए कि जो भी लड़की तुम्हें दिखती है वो भी तुम्हारी बहन की तरह है। अगर तुम उसे बहन की तरह रक्षा करोगे तो कोई न कोई तुम्हारे बहन की रक्षा करने के लिए भी खड़ा होगा। उसका फिर रक्षा होगा। गलत नजर से किसी को ना देखें। हर किसी के लाइफ में एक लेडी होगी जो सिर्फ उसकी होगी सब को क्यों इस नज़रों से देखना। वह मां, बहन और सोसाइटी की रेस्पेक्टेड लेडी की तरह हैं।

आरजेडी नेत्री मंजू सिंह
द बिग कन्वर्सेशन में मंजू सिंह से सवाल था कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय महिला दिवस के नाम पर जिस तरीके से बेहतर कार्य कर रही महिलाओं को सम्मानित करता है ऐसे में वह अवार्ड बहुत खास लोगों तक ही सीमित नजर आती है। क्या केंद्र सरकार और राज्य सरकार अंतिम वो महिला जो देश के विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर कार्य कर रही है उन तक पहुँचकर उन्हें प्रेरित करने में सफल नज़र आती हैं या, इसमें सरकार द्वारा एक बड़ी चूक दिखती है? मंजू सिंह ने अपने जवाब में कहा, सिकेन, बहुत महत्वपूर्ण सवाल है आपका, अभी जो देश में महिलाओं को सम्मान दिया जा रहा है, मैं कहूंगी एक मजाक हो गया है। यह सम्मान उन लोगों को नहीं मिलता जिन्हें मिलनी चाहिए। इसमें भी राजनीति है। देखिये, राजनीति का मतलब होता है बुराई से लड़ना, अब यहाँ इसका उल्टा मतलब हो गया है अच्छाई से लड़ना। देखिये, आय दिन किसी को सम्मान मिल रहा है तो, किसी को इनाम मिल रहा है। बिना कुछ किये चार दिन आये हुए होते है उसकों इनाम मिल गया। महीनों दिन राह देखकर के लोग काम कर रहे हैं, गाँव में बहुत टैलेंट है मैं आपको बताती हूँ। कुछ दिन पहले मैं एक महिलाओं के कायर्क्रम में गई थी। मैं हैरान रह गई एक महिला को देखकर क्योंकि वह महिला लगभग पिछले 5 वर्षों से लगातार महिलाओं के बीच जाकर स्वच्छता का आभियान चला रही है। क्या इन्हें सम्मान नही मिलनी चाहिए? लेकिन नहीं यहाँ दिखावापन हो गया, अगर मैं चार काम करती हूँ, उसको मैं जब तक सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करती तब तक लोग मानने को तैयार नहीं होते। मैं अपने फैमिली के साथ डिनर कर रही हूँ और तब मैं सोशल मीडिया पर डिनर की पोस्ट शेयर करूंगी तब जो है लोग बोलेंगे ‘हां’ मैडम जो है अपने परिवार को समय देती है। उसके पीछे अगर मैं फेसबुक या सोशल मीडिया से हट के कोई काम करूं, तो उसे लोग नहीं पहचानते हैं। आखिर क्यों? दिखावापन क्यों? मैं चाहती हूँ कि ये महिलायें जो गाँव में काम कर रही हैं, इनमें सब टैलेंटेड हैं। यह है कि ये अपने टैलेंट को नहीं पहचानती, इन्हें वह प्लेटफार्म नहीं मिल रहा, तो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को इन बिन्दुओं पर आगे आना चाहिए और इनकों समर्थन करना चाहिए। प्राइज के असली हक़दार ये महिलाएं हैं। दिन-रात, घर-परिवार, ऑफिस या अन्य कामों को कर के दो पैसे कमाने के लिए लगी रहती हैं। मैं चाहूंगी की इनको आगे लाया जाये और इस ओर ज्यादा फोकस किया जाये।

हमलोग पढ़े लिखे हैं फिर भी रात में जब गाड़ी से चलते है तो कही न कही इन्सेक्युरिटी लगती है। कुछ दिन पहले की मैं बात बताऊ। एक मोटर साइकिल जिसमें कोई नंबर नहीं वह मेरे आगे पीछे जा रहा था कुछ दूर आगे जाने के बाद मैंने गाड़ी रोक कर पूछी, आपको कोई प्रॉब्लम है? या तो आप फ़ास्ट जाइये या नहीं तो मेरे पीछे रहिये! आगे पीछे जो आप कर रहे हैं और इसकी कोई प्रॉब्लम है तो मैं प्रॉब्लम सॉल्व कर सकती हूँ। फिर इसके बाद वह सीधा चला गया। अगर मेरे जगह कोई और लेडी होती तो वह किस कंडीशन में होती? तो यह फेस करना पड़ रहा है। यह बहुत बड़ी चुनौती हैं लड़कियों व् महिलाओं के लिए। समाज में अपने ही घर में फेस करना पड़ता है। वहज आपको भी पता है। सेक्सुअल हरासमेंट की शिकारें लड़कियां अपने ही घरों में होती हैं और ऐसे स्थिति हैं कि ना किसी को बता सकती हैं। सबसे पहले बात आ जाती है इज्जत की। यह ऐसा शब्द सामने आ जाता है जिससे मुहं पर ताला लग जाता है। तो इन चीजों पर महिलाओं के साथ बैठकर हमें उन्हें कॉन्फिडेंट करने की जरूरत है।

About the author

Taasir Newspaper