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अगर कम है Sperm काउंट तो ये इंजेक्शन करेगा मदद

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Written by Taasir Newspaper

Taasir Urdu News Network | Uploaded on 12-July-2018

कम शुक्राणुओं के चलते मां-बाप बनने की उम्मीद छोड़ने वाले कपल्स के लिए खुशखबरी आई है. ऐसे कपल्स  इन्ट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (इक्सी) टेक्नोलॉजी के जरिए संतान का सुख प्राप्त कर सकते हैं. इस पद्धति को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल होते हैं. लेकिन डॉक्टर से बात करने और सही तरीके से समझाने के बाद दंपति इक्सी पद्धति को अपनाकर माता-पिता बन सकते हैं. यहां जानें क्या होती है इक्सी और कैसे ये आपको संतान प्राप्ति करा सकती है.

क्या होती है इक्सी? 
इंदिरा आईवीएफ की आईवीएफ विशेषज्ञ, डॉ. निताषा गुप्ता का कहना है कि इक्सी आईवीएफ की एक अत्याधुनिक तकनीक है. पुरुषों में कम शुक्राणु के कारण ही इस तकनीक का आविष्कार हुआ. इसमें महिला के अण्डों को शरीर से बाहर निकालकर लैब में पति के शुक्राणु से इक्सी प्रक्रिया के द्वारा इन्जेक्ट कर भ्रूण तैयार किया जाता है और फिर इस भ्रूण को महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है. इसमें फायदा यह है कि शुक्राणु की संख्या एक से पां मि./एम.एल. होने पर भी इक्सी तकनीक अपनाई जा सकती है. शुक्राणु की कम मात्रा, धीमी गतिशीलता, खराब गुणवत्ता, मृत एवं शून्य शुक्राणु में इक्सी तकनीक कारगर है.

क्यों खराब या कम हो रहे हैं पुरुषों के स्पर्म?
महिलाओं में प्रेग्नेंसी के दौरान गर्भपात का प्रमुख कारण है पुरुष पार्टनर के स्पर्म का खराब होना. इसकी सबसे बड़ी वजह से दूषित वातावरण, जहरीली हवा में सांस लेने के कारण पुरुषों में शुक्राणुओं के खराब होने और स्पर्म काउंट में कमी आने जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं. इसके चलते कई बार कोशिश करने के बाद भी गर्भधारण नहीं हो पाता है.

आईवीएफ विशेषज्ञ, डॉ. अरविंद वैद के अनुसार, “पुरुषों में फर्टिलिटी कम होती जा रही है. इसका सबसे पहला और प्रमुख संकेत संभोग की इच्छा में कमी के रूप में सामने आता है. स्पर्म सेल्स के खाली रह जाने और उनका अधोपतन होने के पीछे जो मैकेनिज्म मुख्य कारण के रूप में सामने आता है, उसे एंडोक्राइन डिसरप्टर एक्टिविटी कहा जाता है, जो एक तरह से हारमोन्स का असंतुलन है.

पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे जहरीले कण, जो हमारे बालों से भी 30 गुना ज्यादा बारीक और पतले होते हैं, उनसे युक्त हवा जब सांस के जरिए हमारे फेफड़ों में जाती है, तो उसके साथ उसमें घुले कॉपर, जिंक, लेड जैसे घातक तत्व भी हमारे शरीर में चले जाते हैं, जो प्रकृति में एस्ट्रोजेनिक और एंटीएंड्रोजेनिक होते हैं. लंबे समय तक जब हम ऐसे जहरीले कणों से युक्त हवा में सांस लेते हैं, तो उसकी वजह से संभोग की इच्छा पैदा करने के लिए जरूरी टेस्टोस्टेरॉन और स्पर्म सेल के प्रोडक्शन में कमी आने लगती है.

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