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प्रयागराजः जानिए कौन हैं ये कुंभ के कमांडो!

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Written by Taasir Newspaper

Taasir Urdu News Network | Uploaded on 11-February-2019

जब-जब सनातन धर्म पर संकट गहराता है और सारी उम्मीदें ख़त्म हो जाती हैं.. तब-तब वो आते हैं.. धर्म रक्षा की आखिरी जंग लड़ने. वो तब भी आते हैं जब-जब देश ख़तरे में होता है. या फिर हमलावरों ने सर उठाया. राख से लिपटे हुए. बिना लिबास वाले कमांडो. जिनके माथे पे तिलक, हाथो मे त्रिशूल और आंखों में गुस्सा होता है. हर हर महादेव कहते हुए जो धर्म और देश पर मर मिटने को तैयार हैं… वही हैं कुंभ के कमांडो.

वो कर्म से हठी और धर्म के रक्षक हैं. वो दिखने में रहस्य और मन से साधु हैं. वो संस्कृति की आन और सभ्यता के पहरेदार हैं. खून में उनके जुनून और दिल में देश है. वो कोई और नहीं सनातन धर्म के कमांडो हैं. लेकिन वो आते कहां से हैं. वो चले कहां जाते हैं. उनकी दुनिया कैसी होती है. वो किस दुनिया में खो जाते हैं. ये कोई नहीं जानता. सबको बस ये पता है कि जब कुंभ या अर्धकुंभ आता है तो लाखों की तादाद में नागा साधु एक साथ दुनिया को नज़र आते हैं. लेकिन जब कुंभ-कुंभ हो जाता है तो वो सबके सब अचानक ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे कभी थे ही नहीं.

नागा के तिलस्म को सुलझाने से पहले आपको बता दें कि एक बार फिर कुंभ में दिखाई दे रहे नागा लापता होने वाले हैं. इससे पहले कि ये फिर लापता हो जाएं इन्हें देख लीजिए. समझ लीजिए.. कुंभ मेले में 45 दिन के कल्पवास के बाद अखाड़ों के बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी आने की तैयारी शुरू हो गई है. काशी में ये गंगा घाटों के साथ अखाड़ों के मठों में डेरा डालेंगे. परंपरा के मुताबिक सभी अखाड़े होली तक वाराणसी में रहने के बाद फिर से रहस्य हो जाएंगे.

तो इससे पहले कि ये फिर से रहस्य बन जाएं आइये जानते हैं कि आखिर क्या है नागा सन्यास का तिलिस्म? क्या है नागा सन्यास का रहस्य? और कौन होते हैं नागा साधु? आज हम आपको लेकर चलेंगे नागा साधुओं के संसार में, और सुनाएंगे नागा सन्यासियों के रहस्यलोक की कहानी.

कहते हैं भारतीय सनातन धर्म के मौजूदा स्वरूप की शुरुआत आदिगुरू शंकराचार्य ने की थी. उनका जन्म आठवीं सदी में हुआ और उन दिनों हिंदुस्तान की हालत इतनी अच्छी नहीं थी. देश की अकूत दौलत लगातार विदेशी आक्रमणकारियों को यहां खींच रही थी. संकट सनातन धर्म पर भी था. ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन धर्म के लिए गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ के नाम से चार पीठों की स्थापना की और धर्म रक्षा के लिए अखाड़ों की नींव रखी.

पहले-पहल इन अखाड़ों से धर्म रक्षा के लिए कुछ करने की इच्छा रखनेवाले नौजवान जुड़े, जिन्होंने व्यायाम और कसरत के ज़रिए पहले खुद को मज़बूत किया और दुश्मनों से लोहा लिया. लेकिन फिर ये अखाड़े वैराग्य की सीख देने वाले आश्रमों में तब्दील हो गए. राष्ट्र और धर्म की सेवा के लिए अखाड़ों से जुड़नेवाले लोग घर संसार से कटने लगे. और नागा परंपरा का जन्म हुआ.

भगवान शिव और अग्नि को अपना आराध्य मानने वाले इन नागा साधुओं ने अपनी अलग ही दुनिया बसा ली. समाज और आम जन-जीवन से दूर इन्होंने पहाड़ों और गुफ़ाओं बेहद कठिन और तपस्वी जीवन जीनेवाले ये नागा साधु साधना में लीन होने लगे और तब से लेकर आजतक इनका जीवन ऐसे ही अनगिनत रहस्यों से घिरा रहा. नागा ना तो सांसारिक जीवन जीते, ना ही कोई वस्त्र पहनते हैं. फल-फूल ही इनका भोजन रहा और आकाश ही इनका लिबास. और आज भी यही साधक इस कुंभ के मेले का सबसे बड़ा आकर्षण हैं.

भभूत में लिपटा पूरा शरीर. आंखो में हर वक्त दहकते आध्यात्मिक शक्ति के शोले. माथे पर त्रिपुंड. रुद्राक्ष से सुशोभित भुजाओं में शिव शक्ति प्रतीक त्रिशूल और पत्थर से चेहरे पर भोले शंकर की जय जयकार का भाव, सनातन धर्म के इस प्रचंड प्रज्जवलित रूप को ही दुनिया नागा सन्यासी कहती है.

मगर इन्हें नागा बनने का फैसला लेने से पहले अपने घरबार का मोह. दोस्त यार का संग. सब छोड़ना पड़ता है. यहां तक कि इन्हें अपना इतिहास मिटाने के लिए खुद का अंतिम संस्कार भी करना पड़ता है. संस्कार खुद के हाथों खुद के श्राद्ध का. संस्कार खुद के पिंडदान का. अपनी पिछली 14 पीढ़ियों का पिंडदान और आखिर में खुद का पिंडदान. ताकि दुनिया के हर रिश्ते से अगला-पिछला हिसाब समाप्त हो जाए.

इसके बाद इन्हें नागा दीक्षा दी जाती है, जहां दो तरह के नागा साधु तैयार होते हैं. एक दिगंबर नागा साधु. दूसरे श्री दिगंबर नागा साधु. दिगंबर नागा साधु एक लंगोट धारण करने के अलावा और कोई कपड़ा नहीं पहनते. जबकि श्री दिगंबर की दीक्षा लेने वाले साधु पूरी तरह निर्वस्त्र रहते हैं. सबसे मुश्किल श्री दिगंबर नागा साधु बनना ही होता है क्योंकि तब संयम और ब्रह्मचर्य पर डटे रहने के लिए उनकी सभी इंद्रियां नष्ट कर दी जाती है.

निर्वस्त्र रहने वाले साधु पूरे शरीर पर राख को मल कर रखते हैं. इसकी भी दो वजहें होती हैं. एक तो राख नश्वरता की प्रतीक है दूसरे राख एक तरह के आवरण का काम करती है ताकि भक्तों को पास आने में किसी तरह का संकोच न रहे.. नागा साधु जिस राख को लपेटते हैं वो कई बार चिताओं से ली गई मुर्दों की राख होती है तो कई बार जिस धूनी के सामने वो बैठे रहते हैं उसी की राख को मल लिया जाता है.

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