आस्था लाइफस्टाइल

बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्था का केन्द्र है सलामतपुर स्थित बोधिवृक्ष

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Written by Taasir Newspaper
TAASIR HINDI NEWS NETWORK ABHISHEK SINGH

रायसेन, 20 सितम्बर (हि.स.)। रायसेन जिले के सांची-सलामतपुर के पास 18 फिट उंची पहाड़ी पर स्थित बोधिवृक्ष दुनियां भर के बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिये आस्था केन्द्र है। इस बोधिवृक्ष को श्रीलंका के राष्ट्रपति महेन्द्र पक्षे ने ठीक आठ साल पहले आज ही के दिन 21 सितम्बर 2012 को बौद्ध विश्वविद्यालय के शिलान्यास के अवसर पर लगाया था। इस बोधिवृक्ष की सुरक्षा में चौबीस घंटे जवान तैनात रहते हैं।

यह बोधिवृक्ष बिहार के गया जिले में बोधगया स्थित उसी बोधिवृक्ष का हिस्सा है, जिसके नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ था और वे भगवान गौतम बुद्ध कहलाये। यह बोधि वृक्ष पीपल का पेड़ है। इस पेड़ के नीचे बुद्ध को 528 ईसा पूर्व ज्ञान अर्थात बोधि की प्राप्ति हुई, इसलिये यह बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाने लगा।

कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का हृद्य परिवर्तन हुआ। उन्होंने हिंसा त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया और बौद्ध धर्म के प्रचार में लग गये। सम्राट अशोक ने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को गया स्थित बोधिवृक्ष की शाखा (पौधा) देकर बौध धर्म के प्रचार के लिये श्रीलंका भेजा। श्रीलंका पहुंचकर महेन्द्र और संघमित्रा ने अनुराधपुरम में उस बोधिवृक्ष को लगाया जो आज भी वहां मौजूद है।

श्रीलंका के अनुराधापुरम से बोधिवृक्ष का पौधा लेकर वहां के राष्ट्रपति महेन्द्र पक्षे मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में सांची के पास सलामतपुर पहाड़ी पर बौद्ध विश्वविद्यालय के शिलान्यास के अवसर पर लगाया था। यह भी एक संयोग ही है, कि भारत से बौद्ध अनुयायी बहन संघमित्रा के साथ महेन्द्र बोधिवृक्ष का पौधा लेकर श्रीलंका गये थे और श्रीलंका से 21 सितम्बर 2012 बोधिवृक्ष लेकर भारत आए श्रीलंका के राष्ट्रपति का नाम भी महेन्द्र ही है।

बिहार के गया जिले के बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में आज जो बोधि वृक्ष है, वह 1876 मे नष्ट हो गया था। उस समय लार्ड कनिंघम ने सन 1880 में श्रीलंका के अनुराधपुरम से बोधिवृक्ष की शाखा (पौधा) बुलवाकर इसे बोधगया में इसे पुनः लगवाया था, जो आज भी मौजूद है।

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