राजस्थान हाईकोर्ट ने डिक्री रद्द कर फिर से केस लडऩे का दिया मौका, कहा- समन की सही सर्विस जरूरी
जोधपुर, 26 सितम्बर
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक्स-पार्टी फैसले से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया हैं कि सिर्फ समन नहीं पहुंचने पर अखबार में नोटिस प्रकाशित कर देना पर्याप्त नहीं है। कोर्ट को पहले यह देखना होगा कि सामने वाला व्यक्ति जानबूझकर समन लेने से बच रहा है या सामान्य तरीके से उसे समन पहुंचाना संभव नहीं है। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता कांता देवी और उनके तीन बच्चों के खिलाफ पारित एक्स-पार्टी फैसला और डिक्री रद्द कर दी और मामला फिर से ट्रायल कोर्ट में बहाल करते हुए सभी पक्षों को सुनवाई का पूरा मौका देने के आदेश दिए।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने मामले में चूरू के जिला जज के 29 अगस्त 2024 के आदेश को रद्द करते हुए 23 अगस्त 2017 को कांता देवी के खिलाफ दिया गया एक्स-पार्टी फैसला हटाने का आदेश दिया हैं। अब यह केस फिर से वहीं से शुरू होगा, जहां 16 नवंबर 2013 को चल रहा था। दरअसल पारसराम ने जमीन के बिक्री समझौते के आधार पर बिक्री विलेख यानी सेल डीड करवाने की मांग को लेकर वर्ष 2013 में सिविल मुकदमा दायर किया था। मुकदमे में कांतादेवी, उनके बेटे-बेटियों और सब-रजिस्ट्रार को पक्षकार बनाया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर 2013 में सभी प्रतिवादियों को समन जारी किए, लेकिन समन वापस आ गए। रिपोर्ट में बताया गया कि पुराने पते पर मकान बंद था और कांतादेवी वहां नहीं रहती थीं। समन लेकर पहुंचे कर्मचारी की रिपोर्ट में बताया गया कि पुराने पते पर घर बंद था और कांता देवी जयपुर में रह रही थीं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि वह जयपुर की शंकर विहार कॉलोनी में रहती हैं, लेकिन पूरा पता नहीं मिल पाया था। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने उनका पूरा पते की जानकारी करने या दोबारा सामान्य तरीके से समन भेजने की कोशिश नहीं की।
वादी की ओर से अखबार में नोटिस छपवाने का आवेदन दिया गया, जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया। अखबार में नोटिस छपने के बाद भी कांता देवी और दूसरे प्रतिवादी कोर्ट में पेश नहीं हुए। इसके बाद कोर्ट ने उन्हें एक्स-पार्टी कर दिया और उनकी गैरमौजूदगी में केस की सुनवाई आगे बढ़ाई। इसी दौरान उनके खिलाफ सबूत दर्ज किए गए और बाद में एक्स-पार्टी फैसला और डिक्री पारित कर दी गई।
बिक्री को लेकर एक्स-पार्टी डिक्री
डिक्री के तहत पारसराम को बाकी रकम चुकाने के बाद जमीन की सेल डीड यानी बिक्री की रजिस्ट्री करवाने का अधिकार दिया गया। साथ ही कांता देवी और अन्य प्रतिवादियों को जमीन के कब्जे और खेती में दखल देने के साथ-साथ जमीन किसी दूसरे व्यक्ति को बेचने या ट्रांसफर करने से भी रोकने का आदेश दिया गया। कांता देवी और अन्य को इस एक्स-पार्टी फैसले की जानकारी तब मिली, जब डिक्री लागू कराने की कार्रवाई शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने एक्स-पार्टी डिक्री हटाने के लिए आवेदन किया, लेकिन जिला कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसी आदेश को रालस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी।
अखबार में नोटिस छापना आखिरी विकल्प जैसा नहीं
दोनो पक्षों की सुनवाई के बाद मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी पते पर घर बंद मिलने से यह नहीं माना जा सकता कि व्यक्ति जानबूझकर कोर्ट के समन से बच रहा है। हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ अखबार में नोटिस प्रकाशित हो जाने से यह नहीं माना जा सकता कि सामने वाले व्यक्ति को केस की जानकारी मिल गई और उसकी कानूनी सर्विस पूरी हो गई। कोर्ट को यह भी देखना होगा कि जिस अखबार में नोटिस छापा गया है, उसकी उस इलाके में पर्याप्त पहुंच है या नहीं, जहां संबंधित व्यक्ति रहता है। नोटिस का मकसद सिर्फ अखबार में उसे प्रकाशित करना नहीं, बल्कि संबंधित व्यक्ति तक केस की जानकारी पहुंचाना है। हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस रिकॉर्ड नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि कांता देवी को केस या सुनवाई की तारीख की जानकारी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ अखबार में नोटिस छपने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित मौका मिल गया था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 29 अगस्त 2024 का जिला कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और 23 अगस्त 2017 की एक्स-पार्टी डिक्री भी रद्द कर दी।

