चुनाव आयोग के समर्थन में 42 पूर्व जजों का पत्र, अशांति को बढ़ावा और अराजक तत्वों के प्रोत्साहन का खतरा

नई दिल्ली, 08 अक्टूबर 

देश के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने चुनावों की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग समेत संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के कथित प्रयासों को लेकर चेतावनी दी है कि चुनावों को बदनाम करने की कोशिशों से अशांति को बढ़ावा मिल सकता है और अराजक तत्वों को प्रोत्साहन मिल सकता है।

पूर्व न्यायाधीशों ने एक खुले पत्र में कहा कि बिना ठोस साक्ष्य के ‘‘वोट चोरी’’ के आरोप लगाने तथा संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार ‘‘चोर’’ और ‘‘समझौता कर चुके’’ बताने से लोकतंत्र में जनता के विश्वास को नुकसान पहुंचने का खतरा है। उन्होंने कहा, ‘‘संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, उन्हें बदनाम करना नहीं।’’

पत्र में कहा गया कि भारत में करीब एक अरब मतदाता दस लाख से अधिक मतदान केंद्रों पर मतदान करते हैं और चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 से अधिकार प्राप्त है। पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन सूची को कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर रखते हुए इसकी जिम्मेदारी स्वतंत्र चुनाव आयोग को सौंपी थी।

पूर्व न्यायाधीशों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का बचाव करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 21(3) चुनाव आयोग को किसी भी समय मतदाता सूचियों में संशोधन करने का अधिकार देती है। पत्र के अनुसार, आम चुनावों के बाद से कई बार गहन पुनरीक्षण किए जा चुके हैं और पिछला एसआईआर करीब दो दशक पहले हुआ था।

पत्र में कहा गया कि एसआईआर का उद्देश्य मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियां और दूसरे स्थान पर जा चुके लोगों के नाम हटाना तथा सभी पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल करना है। इसमें कहा गया कि पिछले दो दशकों में हुए पलायन और शहरीकरण के कारण मतदाता सूचियों में सुधार की जरूरत है और स्वच्छ मतदाता सूची प्रत्येक वास्तविक मतदाता के मत की रक्षा करती है।

पूर्व न्यायाधीशों ने एसआईआर पर उच्चतम न्यायालय के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने इस प्रक्रिया को वैध और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में माना तथा इसे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाला बताया। पत्र में कहा गया कि प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई, आपत्ति और अपील जैसे पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।

पत्र में कहा गया कि केंद्र और राज्यों में कई बार सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हुआ है और विभिन्न राजनीतिक दलों ने चुनावी फैसलों को स्वीकार कर लोकतांत्रिक आचरण की मिसाल पेश की है। पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद जनता के विश्वास पर टिकी है और लोगों को बार-बार यह बताना कि उनका वोट मायने नहीं रखता, चुनावी प्रक्रिया में उनके भरोसे को कमजोर कर सकता है।

पूर्व न्यायाधीशों ने राजनीतिक दलों से चुनाव लड़ने तथा अपनी शिकायतें सबूतों के साथ चुनाव आयोग और अदालतों के समक्ष रखने की अपील की। मीडिया से अपुष्ट अटकलों और दावों को प्रसारित करने से पहले उनकी जांच करने को कहा गया। संवैधानिक संस्थाओं से पारदर्शी रहने और वैध चिंताओं का स्पष्टता से समाधान करने तथा नागरिकों से किसी दावे पर कार्रवाई या उसे साझा करने से पहले तथ्यों की पुष्टि करने का आग्रह किया गया।

पत्र पर उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल, जम्मू-कश्मीर एवं दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.सी. पटेल, कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुभ्रो कमल मुखर्जी, सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली तथा गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और गुजरात के पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति एस.एम. सोनी समेत विभिन्न उच्च न्यायालयों के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने हस्ताक्षर किए हैं।

पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि संवैधानिक संस्थाएं किसी सरकार की नहीं बल्कि भारत के लोगों की हैं। उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला अंततः नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्थाओं पर हमला है और सभी भारतीयों से इन संस्थाओं की रक्षा के लिए खड़े होने की अपील की।